100+ Bachpan Shayari


“100+ Bachpan Shayari: Relive the innocence and cherished memories of childhood through these heartwarming verses. Bachpan, a time of laughter, dreams, and carefree days, finds its essence in this beautiful collection. These shayaris evoke nostalgic feelings, taking you back to the days of innocence and wonder. From the joys of playing with friends to the warmth of family bonds, each verse captures the magic of growing up. Let the Bachpan Shayari bring a smile to your face and fill your heart with fond remembrances. Embrace the essence of childhood, where life was a beautiful tapestry of simple pleasures and boundless imagination. Celebrate the spirit of Bachpan with these soulful expressions and relish the treasure trove of emotions it holds.”

Bachpan Shayari

मम्‍मी की गोद और पापा के कंधे,,

ना पैसे की सोच और ना लाइफ के फंडे,

ना कल की चिंता और ना फ्यूचर के सपने,

अब कल की फिकर और अधूरे सपने,

मुड़ कर देखा तो बहुत दूर हैं अपने,

मंजिलों को ढूंडते हम कहॉं खो गए,

ना जाने क्‍यूँ हम इतने बड़े हो गए..

गुम सा गया है अब कही बचपन,,

जो कभी सुकून दिया करता था..

तभी तो याद है हमे

हर वक़्त बस बचपन का अंदाज

आज भी याद आता है..

बचपन का वो खिलखिलाना

दोस्तों से लड़ना, रूठना, मनाना..

कुछ यूं कमाल दिखा दे,, ऐ जिंदगी !

वो बचपन ओर बचपन के दोस्तो

से मिला दे ऐ जिंदगी..

वो बचपन भी क्या दिन थे मेरे..

ना फ़िक्र कोई,ना दर्द कोई..

बस खेलो, खाओ, सो जाओ..

बस इसके सिवा कुछ याद नही..

कोई तो रुबरु करवाओ,,

बेखोफ़ हुए बचपन से,,,

मेरा फिर से बेवजह

मुस्कुराने का मन है..

बचपन जब तक था तब तक सिर्फ इतना पता था की सिर्फ खिलौनो से खेला जाता है, बड़े हुए तो जाना भावनाओं से भी किसी की खेल सकते है।

जब तक बच्चे थे बोझ के डर से कोई सामान तक नहीं उठाने देता था, थोड़े बड़े क्या हुए घर की सारी ज़िम्मेदारियों का बोझ मेरे कंधो पर डाल दिया।

कल की फ़िक्र करने का वक़्त ही कहाँ था, मुझे तो बस छत पे पतंग उड़ाने के वक़्त की फ़िक्र थी।

आज भी रविवार हर रविवार को आता है पर पहले जैसा बच्चों का झुण्ड पार्क में दिखाई नहीं देता।

बच्चों की आँखों ने ख़्वाब देखना बंद कर दिया है, अब उनके सपने मोबाइल ही पूरे कर देता है।

बचपन का सुकून आज भी याद आता है, माँ के हाथों का खाना उनके ही हाथों से खाना आज बी याद आता है।

अगर ज़िन्दगी मौसमों का संगम है तो बचपन इसमें सबसे छोटा और सबसे सुहाना मौसम है।

आज कल हर बच्चे पर ऐसे बोझ बना रखा है, जैसे सबसे पहले वही बड़ा होने वाला है।

जाने कब बीत गए वो दिन बचपन के ना खबर हुई ना सबर हुआ।

इंसान जब बच्चा होता है तब शैतानियां कर के भी मासूम कहलाता है, पर जब बड़ा होता है तब मासूम रह कर भी शैतान कहलाता है।

बचपन भी सब बच्चों का एक सा नहीं होता एक बच्चा कंचे खेलने जा रहा है, तो दूसरा कंचों के कारखाने जा रहा है।

दो बच्चे, दोनों की उम्र एक पर दास्ताँ अलग, एक बच्चा खाना कूड़े में फेंक रहा है और एक बच्चा कूड़े से खाना ढूंढ कर खा रहा है।

कमाल होता है उन गरीब बच्चों का बचपन भी वो चलना सीखते ही घर चलाना सीख लेते हैं।

चंद्रयान चाँद पर बैठा हुआ है और मेरे देश का बच्चा विद्यालय की कक्षाओं को छोड़ कर दूकान पर बैठा हुआ है।

उस बच्चे का तो बचपन भी जाया है जिसके नन्हे सर पर गरीबी का साया है।

हाल मेरे देश के बच्चों का कोई तो सुधार दो उसे किताब की दूकान पर बैठने से पहले कम से कम पढ़ना तो सीखा दो।

किसने कहा बचपन आज़ाद होता है वो बच्चा अपनी गरीबी के हालातों का गुलाम था।

नाम उस गरीब बच्चे का माँ-बाप ने विजय रखा था, पर अफ़सोस जीत से अभी भी काफी दूर था।

खिलौनों से खेलने की उम्र में उसे हर खिलोने का दाम पता था, कौन कहता है आज कल के बच्चो को पैसे की क़ीमत ही नहीं जानते।

पूरा दिन काम कर जेब उस बच्चे की चिल्लर से भरी हुई थी पर उसे खाने का वक़्त नहीं मिला इसलिए पेट खाली था।

बचपन भी कमाल का था खेलते खेलते चाहें छत पर सोयें या ज़मीन पर

आँख बिस्तर पर ही खुलती थी..

वक्त से पहले ही वो हमसे रूठ गयी है,,

बचपन की मासूमियत न जाने कहाँ छूट गयी है..

ना कुछ पाने की आशा, ना कुछ खोने का डर,,

बस अपनी ही धुन, बस अपने सपनो का घर,,

काश मिल जाए फिर मुझे, वो बचपन का पहर..

झूठ बोलते थे फिर भी कितने सच्चे थे,,

हम ये उन दिनो की बात है जब हम बच्चे थे ..

शौक जिन्दगी के अब जरुरतो मे ढल गये,,

शायद बचपन से निकल हम बड़े हो गये..

सुकून की बात मत कर ऐ दोस्त,,

बचपन वाला इतवार अब नही आता..

अपना बचपन भी बड़ा कमाल का हुआ करता था,,

ना कल की फ़िक्र ,ना आज का ठिकाना हुआ करता था..

खेल के मतलब नहीं थे बस खेलना ज़रूरी था, ज़िन्दगी बचपन में कितनी आसान थी जब इसे काटना नहीं जीना ज़रूरी था।

दुआ की थी बचपन में की जल्दी बड़ा हो जाऊं, आज सोचता हूँ न जाने क्या सोच कर मैंने वो दुआ की थी।

ना जल्दी किसी बात की ना देर हुआ करती थी, वही वक़्त सही था बचपन का जब हमे वक़्त तक देखना नहीं आता था।

दम तो नहीं होता उन बचपन के नन्हे हाथों में, पर फिर भी ज़िद्द इतनी जी-जान से पकड़ते हैं की पूरी हो ही जाती है।

वो बचपन ही था जब आँख मूँद कर हर बात पर विशवास कर लिया करते थे, आज बड़े होने पर कितना भी यक़ीन दिला लो किसी पर भरोसा नहीं होता।

आँख बंद होते ही खेलने के सपने और आँख खुलते ही खेलने का ख्याल आता था, बस कुछ ऐसा ही बचपन था मेरा।

मुझे फिर से वो कल्पना के धागों से बने कम्बल औढ़ा दे ऐ-ज़िन्दगी, या तो बचपन लौट जाए या मुझे बचपन की और लौटा दे ऐ-ज़िन्दगी।

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